Random Musings: Speak less than you know, always

One who is courteous and cultured deliberately attempts to be civil and polite under all circumstances, come what may. One who is sophisticated and refined also chooses to follow the etiquette and adopts the righteous way of conduct with others even in the most trying times. Our civility, courtesy and cultured approach towards others make us human and humane, and define us.
My mother, who single-handedly raised me and my siblings, taught us these principles of life and living quite early on in our lives and inculcated them deep in our beings. Her life lessons and learnings have profoundly influenced me all through. They were deeply ingrained in my being and stayed with me long after she was gone. What troubles me is to see how these life values are mostly conspicuous by their absence in our younger generation.
Let me explain what I mean when I say one who is courteous is always calm, composed and quiet. More importantly, one must learn to lend an ear to all but refrain from saying everything that one thinks. This restraint comes with age and experience, I agree, but one can start conditioning oneself right from childhood. The most significant difference between being couth and uncouth is the tone and tenor of one’s voice. If one can master one’s voice, one can rule the world, vanquish one’s enemies and emerge victorious. She taught that being soft-spoken doesn’t mean being diffident; instead, it is a great character strength and a defining trait of a good upbringing. Still waters run deep, she would often say, and so I still believe. She despised raising one’s voice because being loud may do more harm than good, is what she told us. Voice is the medium that conveys our message, and how one says what one wants to say is what makes the real difference. One can take a firm stance by being courteous, polite and calm, and without raising one’s voice. The command over one’s voice requires a kind of maturity that often seems missing among today’s children, and it pains to see their inconsiderate, unruly and unkind behaviour towards their youngsters, peers and even elders, in private and public conversations. Their conversations are more of a noise and nuisance to others, but unfortunately, these youngsters are unmindful of this habit that may do them more harm than good in the long run.
The second most important thing that my mother taught us was to be patient while listening. She said listening helps us understand, increases trust, improves relationships and reduces conflict. She often emphasised that one must let the speaker finish their bit first and patiently wait for our turn to speak. Well, today, you cannot complete a sentence without being stopped midway, and that annoys me no end. The most livid examples are our television news debates, which are more of a nuisance than information, where only two people have the right to speak, either the news anchor or the one allowed to air their views.
Her third piece of advice for mindful conversation was to respect the elders and listen to them carefully, without interrupting and interjecting them in between. This too, is long foregone, and I see none following it, not anymore.
The list of my mother’s life lessons is long; I fondly remember her and deeply admire her parenting style, and I will keep sharing these nuggets of wisdom with you as we go along. But remember that as a parent one must practise what one preaches to children. That way they learn better.
(Cover Image by Gerd Altmann from Pixabay)

The Naked Truth

The article was carried in The Free Press Journal, Mumbai, on July 31, 2022. http://freepressjournal.in/weekend/ranveer-singhs-nude-photoshoot-what-drives-brands-to-use-nudity-in-ad-campaigns

आवारा ख़यालात

“चा चा चा” फ़िल्म में मख़्दूम मोहीउद्दीन की नज़्म “चारागर” को कुछ इस तरह गाया गाया था कि उसके मतलब बड़े ही आमियाना से लगते थे. “एक चमेली के मंडवे तले…”

एक नज़्म और उसकी यादें

1968 में हम ने एस एस सी का इम्तिहान पास किया. तब एस एस सी, ग्यरहवीं जमात हुआ करती थी. जी हाँ, हम 11+4 के ज़माने की देन हैं. 10+2+3 दौर की नहीं. आजकल, बच्चे दसवीं पास करने के बाद, अपने पसंद के कॉलेज में दाख़िला पाने की कोशिश में जुट जाते हैं. उन दिनों , बम्बई ( जी हाँ, तब बम्बई ही था.) गिनती के ही कॉलेज थे, स्टूडेंट भी कम ही थे. इसलिए हर किसी को अपने पसंद के कॉलेज में दाख़िला आसानी से मिल जाया करता था. तब बम्बई की आबादी तक़रीबन 55–60 लाख ही थी.
हमारे वालिद तो हमें छोड़ कर इस दुनिया से तब जा चुके थे, जब हम आठ ही साल के थे. अकेले माँ ने पाला था. इसलिए ग़रीब थे, काफ़ी ग़रीब थे हम. आठ बाय दस की खोली मकान था. लेकिन अम्मी हमें पढ़ाना चाहती थीं. अम्मी ने हमें इस्माइल यूसुफ़ कॉलेज में दाख़िला लेने के लिए कहा, उन्होंने 30 रूपये की रक़म (जो उस ज़माने में हमारी अम्मी के लिए बड़ी रक़म थी) दे कर फ़ौरन कॉलेज में दाख़िला कराने को कहा. हम फ़ीस की रक़म ले कर कॉलेज पहुँचे. फ़ॉर्म भरा, फ़ीस और फ़ॉर्म जमा कराया. बस, हो गया, हमारा दाख़िला.
हमारे कॉलेज का कैम्पस बहुत बड़ा था (उस वक़्त कैम्पस का एक चक्कर लगाने में एक घंटा लग जाया करता था). मुंबई में जहां, आज भी ज़मीन के दाम सोने से महँगे हैं, कहते हैं कि आज भी हमारे कॉलेज का कैम्पस बहुत बड़ा है हालाँकि उस कैम्पस पर कुछ और इमारतें बन जाने के बावजूद.
उन दिनों दो ही कोर्स थे. आर्ट्स या साइंस. कामर्स बहुत नया-नया था. कम ही लोग उस तरफ़ का रुख़ किया करते थे. हमने भी आर्ट्स में दाख़िला लिया. अदब से इश्क़ जो था. कॉलेज का पहला दिन बेहद परेशान-कुन था. हम ग्यारहवीं तक उर्दू मीडियम में पढ़ कर आए थे और कॉलेज में आते ही मीडियम बदल कर अंग्रेज़ी हो गया था. हमारे प्रोफ़ेसर क्या पढ़ा रहे थे, हमारी समझ में कुछ नहीं आ रहा था. (हमने ये मुश्किल कैसे आसान की? अंग्रेज़ी कैसे सीखी? इसकी बात किसी और रोज़ करेंगे).
अब दो ही सब्जेक्ट किसी हद तक राहत का बाएस थे. एक उर्दू और दूसरा फ़ारसी.
आज हम अपने उर्दू के एक प्रोफ़ेसर डॉक्टर आली जाफ़री का ज़िक्र कर रहे हैं.
जनाब वक़ार क़ादरी की किताब “दर्शन” में जो ज़िक्र क़ादरी साहब ने डॉक्टर आली जाफ़री का किया है. उसी से आग़ाज़ करते हैं. क़ादरी साहब फ़रमाते हैं “आली जाफ़री साहब अपने अव्वलीन लेक्चर के लिए आए. उजली शक्ल और मुनासिब क़द ओ क़ामत के मालिक, ये साहब, मुझे किसी पुरानी ब्लैक एंड वाइट फ़िल्म के हीरो महसूस हुए.” क़ादरी साहब, मुझसे काफ़ी जूनियर हैं. इस लिए जब उन्होंने जाफ़री साहब को देखा था तब उनकी सेहत का ग्राफ़ उतरना शुरू हो गया था. लेकिन जब उन्होंने हमें जीने का सलीक़ा सिखाया था तब माशल्लाह, सेहतमंद थे. जैसी उर्दू जाफ़री साहब बोला करते थे वैसी उर्दू सुनने को कान तरसते हैं. शेर पढ़ने का उनका अन्दाज़, बड़ा ही दिलनवाज़ था. हमने शेर पढ़ने का हुनर, उन्हीं से सीखा. क़ादरी साहब ने उनसे सुने जिन अशआर का ज़िक्र किया है, वो हम जाफ़री साहब से बरसों पहले सुन चुके थे. क़ादरी साहब ने इन अशआर का ज़िक्र किया है —

ख़ूबरू ख़ूब काम करते हैं
इक निगाह सूं ग़ुलाम करते हैं
दिल के आइने में है तस्वीर ए यार
इक ज़रा गर्दन झुकाई देख ली
कैसे कैसे ऐसे वैसे हो गए
ऐसे वैसे कैसे कैसे हो गए

हम कॉलेज के दिनों में Inter Collegiate Elocution Competitions में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया करते थे. एक बार हमें नए मुक़ाबले में जाना था. नई तक़रीर लिखने का मूड नहीं था. इसलिए पुरानी तक़रीरों के हिस्से मिला कर एक नई तक़रीर लिख ली और जाफ़री साहब को Approval के लिए दे दी.
कुछ देर बाद जाफ़री साहब ने हमें कॉमन रूम में बुलाया और तक़रीर का काग़ज़ वापस करते हुए कहा “मियाँ, इन सारे अल्फ़ाज़ से कान आशना हैं.” हमने अपनी दुम दबाई, काग़ज़ वापस लिया और लौट आए.
कॉलेज मैगज़ीन के लिए हमने एक नज़्म लिखी और जाफ़री साहब को approval के लिए दे दी. जाफ़री साहब क्लास में तशरीफ़ लाए, नज़्म हमें लौटाते हुए कहने लगे “बहर में नहीं है”. हमने कहा “सर, पढ़ कर सुना दूँ”. जाफ़री साहब का जवाब था, “गाई जा सकती है, बहर में नहीं है.”
इसके बाद “अरूज़” की तालीम हमें जाफ़री साहब ने ही दी.

उन्हों दिनों एक फ़िल्म रिलीज़ हुई थी जिसका उनवान था “चा चा चा”. इस फ़िल्म में मख़्दूम मोहीउद्दीन की नज़्म “चारागर” को कुछ इस तरह गाया गाया था कि उसके मतलब बड़े ही आमियाना से लगते थे.
नज़्म कुछ यूँ है—

एक चमेली के मंडवे तले
मैकदे से ज़रा दूर उस मोड़ पर
दो बदन
प्यार की आग में जल गए
प्यार हर्फ़ ए वफ़ा प्यार उनका ख़ुदा
प्यार उनकी चिता
दो बदन
ओस में भीगते, चाँदनी में नहाते हुए
जैसे दो ताज़ा रु ओ ताज़ा दम फूल पिछले पहर
ठंडी ठंडी सुबक-रव चमन की हवा
सर्फ़ ए मातम हुई
काली काली लटों से लिपट गर्म रुख़सार पर
एक पल के लिए रुक गई
हमने देखा उन्हें
दिन और रात में
नूर ओ ज़ुल्मात में
मस्जिदों के मीनारों ने देखा उन्हें
मंदिरों की किवाड़ों ने देखा उन्हें
मैकदे की द्राडों ने देखा उन्हें
अज़ अज़ल ता अबद
ये बता चारगर
तेरीज़ंबील में
नुस्ख़ा ए कीमिया ए मोहब्बत भी है
कुछ इलाज ओ मदावा ए उल्फ़त भी है?
एक चंबेली के मंडवे तले
दो बदन

फ़िल्मी गाना फ़हश सा था, हम गुनगुनाते हुए ख़ुशी ख़ुशी चले जा रहे थे अपनो कैम्पस में. हमें मालूम ना था की हमारे पीछे जाफ़री साहब हैं. उन्होंने हमसे पूछा “मियाँ, इल्म है, ये नज़्म मख़्दूम ने क्यूँ कही थी?” हमने अपनी ला इलमी का इज़हार किया. जाफ़री साहब ने बताया कि जब हैदराबाद में एक नवजवान लड़के और नवजवान लड़की को इसलिए जला दिया गाया था कि वो दोनों अलग अलग मज़हब के होने के बावजूद शादी कर ली थी. उन दोनों को ज़िंदा जला दिया गाया था. उसी जुल्म का सोग मनाने के लिए मख़्दूम ने ये नज़्म कही थी. ये सुनते ही हमारे रोंगटे खड़े हो गए. उस दिन से आजतक जब भी ये नज़्म सुनता हूँ या पढ़ता हूँ तो आँखें भीग ही जाती हैं.

Ek Chameli Ke Mandve Tale ~ एक चमेली के मंडवे तले

What’s in a name?

छोटे-छोटे काम वाले लोग ऐसा कर सकते हैं। कोई बड़ी कंपनी ऐसा रिस्क नहीं ले सकती है। जिसका करोड़ो का बिजनेस है वह ऐसा काम नहीं करेगा। कोई बड़ी कंपनी कहे कि हम सबसे खराब नमक दे रहे हैं, खाकर तो देखें तो कोई खरीदेगा ? यह छोटे शहरों और छोटी जगहों पर चल सकता है। चला तो ठीक, नहीं चला तो दूसरा नाम रख लेंगे।

Jameel Gulrays
My thoughts on the negative product naming culture prevalent these days was published in Navbharat Times’ edition dated April 3, 2022.


सेलफोन के ईजाद से बहुत साल पहले, एक काले रोटरी-डायल टेलीफोन के जादुई शक्ति ने मेरे बचपन और अस्सी के दशक में जन्में अन्य बच्चों की कल्पनाओं को ऊँची उड़ान दी थी।

देवाशीष मखीजा, लेखक और फिल्म निर्देशक

कोरोमंडल एक्सप्रेस में हमारे डिब्बे को अलग कर बैंगलोर मेल में लगाया जा रहा था। हमारे डिब्बे को छोड़कर अन्य सभी यात्रियों की यात्रा मद्रास में समाप्त हो चुकी थी । हमारा वाला डिब्बा करीब तीन घंटे से एक ही जगह स्थिर खड़ा था, और उसके दोबारा चलने के इंतज़ार ने मेरी बेचैनी को बढ़ा दिया था । मैंने माँ से हमारा काला वाला टेलीफोन मांगा ताकि मैं नानी को कॉल कर उनसे कुछ गुलाब जामुन भेजने के लिए कह सकूं। “अगर हमारी ट्रेन कभी शुरू नहीं हुई तो हम कभी बैंगलोर नहीं पहुंचेंगे,” मैंने कहा, “और पिंकू सब कुछ चट कर जायेगा ।” अपनी छोटी बेटी के साथ यात्रा कर रही एक मारवाड़ी महिला बगल की सीट पर बैठी थी। माँ को उलझन में देखकर उसने मुझे खुश करने के लिए कुछ पेपर सोप निकाल कर मेरे हांथों में थमा दिया । मैंने पहले कभी पेपर सोप नहीं देखा था। उसने मुझसे कहा, “अगर नानी का नंबर डायल करने पर आपकी उंगलियां साफ नहीं होंगी, तो वह आपको नहीं सुन पाएगी,” और धीरे से मुस्कुराई। दरवाजे के पास वॉश बेसिन में अपने हाथों को साफ करने में मैंने लगभग आधा पैक इस्तेमाल कर लिया । तब तक बोगी नई ट्रेन से जुड़ चुकी थी और हमारी यात्रा फिर से शुरू हो गयी थी । 

कैम्पा-कोला बेचने वाले लड़के को देखकर मैं गुलाब जामुन को भूल ही गया ।

अबोध बचपन में उस काले रोटरी-डायल टेलीफोन को मैं किसी जादू से कम नहीं समझता था। उससे मैं अपने लिविंग रूम में घूमते उस ग्लोब के दूसरे छोर पर बसे चाचा-चाची की आवाज़ें सुन सकता था। मुझे किसी से संपर्क करने के लिए केवल एक जादुई कोड की आवश्यकता थी – पांच अंकों की संख्या। इसलिए मुझे यह मानने में बिल्कुल भी संकोच नहीं हुआ ही कि वह ब्लैक बॉक्स बहुत कुछ करने में सक्षम था। अगर मैं अपनी आंखें बंद कर लेता और एकाग्र हो जाता तो शायद मैं उन लोगों को देख सकता जिनसे मैं बातें करता था। और शायद मैं उन्हें टेलीफोन के नीचे खिसकाकर पत्र भी भेज सकता था। और यह भी कि मैं उसकी मांग अपनी ट्रेन यात्रा पर भी कर सकता था, और नंबर घुमा कर नानी से बात कर सकता था।

लगभग बीस साल बाद मैं जिस विज्ञापन एजेंसी में बतौर कॉपीराइटर कार्यरत था वहां मैंने उस दिन खुद को अपने बॉस के केबिन में बंद कर लिया था क्यूंकि मैंने कसम खायी थी कि जब तक मैं बिहार में सेल-फोन सेवाओं के शुभारंभ की घोषणा करने के लिए एक प्रेस विज्ञापन के लिए एक शीर्षक नहीं लिख लेता, तब तक बाहर नहीं निकलूंगा ।

मुझे उस कमरे में बंद हुए एक दिन से अधिक समय बीत गया था। मेरी समय सीमा बहुत पहले बीत चुकी थी और मैं हताश, कमजोर और बेचैन महसूस कर रहा था। 

तभी दरवाजे पर एक हलकी सी खट-खट हुई और किसी ने फैक्स पेपर नीचे से खिसका दी। उस पर एक मोटा-मोटी खींचे हुए डिब्बे के अन्दर लिखा हुआ था – ‘हमारी प्रतियोगी का अभियान।’ डिब्बे के अंदर मेरे काले टेलीफोन का जाना-पहचाना ग्राफ़िक था। और उसके बगल में, एक बदसूरत हिंदी फ़ॉन्ट में शोले का प्रसिद्ध डायलॉग था: “अब तेरा क्या होगा कालिया?”

उस वक़्त मुझे पता नहीं क्यों अचानक गुलाब जामुन खाने कि इच्छा हुई थी।

(नोट: बैंगलोर बेंगलुरु में बदल गया है, मद्रास चेन्नई हो गया है, और कालिया अब ‘पीरियड’ फिल्म की शूटिंग के लिए मुश्किल से मिलने वाला प्रॉप है)

देवाशीष मखीजा (nakedindianfakir@gmail.com) मुंबई में रहने वाले एक लेखक और फिल्म निर्देशक हैं, जिन्होंने लघु फिल्में ‘अगली बार’ (2015) और ‘तांडव’ (2016), फीचर फिल्में ‘अज्जी’ (2017),  और राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता ‘भोंसले’ (2020) बनाई हैं। मखीजा लघु कहानियों के संग्रह ‘फॉर्गेटिंग’ (2014) और नीव पुरस्कार विजेता उपन्यास ‘ओंगा’ (2021) के लेखक हैं।
(The piece was first published in Vol LVI No 48, dated November 27, 2021, in the Economic & Political Weekly in English, and has been adapted in Hindi by Shillpi A Singh for this blog)

Street hawker Kallu Kewat songs reflect people’s poet Nazeer Akbarabadi’s style

नज़ीर अकबराबादी दुनिया के पहले एडवरटाइजिंग जिंगल राइटर थे।उन्होंने लगभग हर चीज़ पर नज़्म लिखी है। नज़ीर ऐसे जनकवि थे जिन्हें आप कुछ भी दे दीजिये, वो उसको बेचने के लिए आम जन की जुबान में नज़्म लिख डालते थे।रंगकर्मी, शायर और लेखक हबीब तनवीर ने अपने सबसे यादगार कृति ‘आगरा बाज़ार’ में शायर नज़ीर अकबराबादी की नज़्मों को पहली बार १९५४ में नाट्य रूप में पेश किया था।आगरा के बाज़ार में घोर मंदी छाई हुई थी और कुछ भी नहीं बिक रहा था। वहां एक ककड़ी वाले के दिमाग़ में यह बात आयी कि यदि कोई कवि उसकी ककड़ी के गुणों का बखान कविता में कर दे तो बिक्री ज़रूर बढ़ेगी। वो कई शायरों के पास गया पर कोई भी इस काम के लिए राज़ी नहीं हुआ । अंत में वह शायर नज़ीर साहब के पास पहुंचा। उन्होंने फौरन उसका काम कर दिया। वह नज़ीर की लिखी ककड़ी पर कविता गाता हुआ बाजार में आता है और उसके यहां ग्राहकों की भीड़ लग जाती है। फिर तो लड्डूवाला, तरबूज़ वाला, बाला बेचने वाला, आदि सब एक-एक करके वही करने लगते हैं और देखते ही देखते सारा बाज़ार नज़ीर साहब के गीतों से गूंजने लगता है।
बरसों बाद एक आम भारतीय ने अपने लिखे शब्दों से मुझे जनकवि नज़ीर अकबराबादी की याद दिला दी है। जी हाँ, मैं उस लड्डूवाले की बात कर रहा हूँ जिसने ट्विटर पर हुए वायरल एक वीडियो से हमारा दिल जीत लिया है। नज़ीर साहब की मानवीय शायरी के इर्द-गिर्द बुना गया नाटक आगरा बाजार और बुंदेली कलाकार कल्लू केवट द्वारा लड्डू बेचने के लिए लिखा हुआ मजेदार गीत दोनों ही दिल को छू लेते हैं । कल्लू केवट का अंदाज-ए-बयान नज़ीर अकबराबादी साहब से बहुत मिलता-जुलता है। मिलिए कल्लू कलाकार से..

Kallu Kalakar!